Posts

सभी भावों का राजा काम है।

🌹●सभी भावों का राजा काम है। इस राजा का निवास स्थान है, सप्तम भाव। यहाँ यह शेषषय्या पर सोता है। इसके नाभिकमल पर विद्यमान ब्रह्मा सृष्टि करते-करते बूढ़ा होकर मर जाता है पर उस शक्ति को नहीं जान पाता जिससे वह सृष्टि रचता है। मैं इस शक्ति की शरण में हूँ। यह शक्ति काम है। इसका कार्य रति है । जहाँ काम है वहाँ रति। रति और काम, बाहर से दो हैं और भीतर से एक हैं। बायें नासा छिद्र में रति नाचती है। दायें नासा छिद्र में काम ताल ठोंकता है। ये दोनों नासा छिद्रों में अलग-अलग हैं। इन छिद्रों से बाहर और भीतर एक हैं। क्योंकि दोनों छिद्र आगे चल कर एक में मिलकर श्वासनली बन जाते हैं। कण्ठ इनका मिलन स्थल है। छिद्रों के बाहर ये आकाश में मिलते हैं। रति चन्द्र है। काम सूर्य है। चन्द्र स्त्री है। सूर्य पुरुष है। इसे हम यों भी कह सकते हैं- जहाँ सूर्य और चन्द्र हैं, वह नाक है।  १. नाक = स्वर्ग/द्युलोक/आकाश।  २. नासिका घ्राणेन्द्रिय/ श्वसन द्वार । √★★इस नाक में, चन्द्र स्वर एवं सूर्य स्वर निरन्तर रहते हैं। उस नाक में, चन्द्र ग्रह एवं सूर्य ग्रह सतत विराजते हैं। चन्द्रस्वर/ चन्द्र ग्रह = स्त्री/ रति । ...

यश और यक्षिणी#राजसी_देवात्माएँ उपदेवता कहलाती हैं। यक्ष, गन्धर्व और किन्नर-- ये तीन वर्ग उपदेताओं के हैं। 16 प्रकार के यक्ष- यक्षिणियां हैं। वे स्वयं सुन्दर होते हैं और सौंदर्य के प्रेमी भी होते हैं। मनुष्य के प्रति इनका विशेष आकर्षण होता है। सुन्दर और आकर्षक स्त्री के प्रति यक्षों की रूचि सर्वाधिक होती है। जहाँ सुन्दर, कमनीय, लावण्यमयी स्त्री को देखते हैं, तुरन्त मोहित हो जाते हैं वे उस पर और विभिन्न प्रकार से वे उसकी सहायता करते हैं अदृश्य रूप से। यक्ष लोग अत्यधिक कामुक और रतिप्रिय होते हैं। वे काम-क्रीड़ा और रति-क्रिया के समस्त गूढ़ रहस्यों से परिचित होते हैं। जो कलाकार काम और रति की विभिन्न मुद्राओं का आश्रय लेकर श्रंगारिक मूर्ति या चित्र का निर्माण करते हैं, उनको बराबर अगोचर सहयोग मिलता है यक्षों का। जो लोग आत्माकर्षिणी विद्या की सिद्धि को उपलब्ध हैं, उनको तो इस दिशा में भरपूर सहयोग मिलता है यक्षों का। कभी-कभी तो सुन्दर मानव के रूप में भी प्रकट होकर मनुष्यों की सहायता करते हैं। ऐसी ही यक्षिणियां भी होती हैं। वे भी जहाँ सुन्दर, आकर्षक, युवा व्यक्ति को देखती हैं, तुरंत मोहित हो जाती हैं वे। वे भी कामुक और रतिप्रिया होती हैं। उनकी ऑंखें मोरनी जैसी होती हैं। वे पुरुषों से संपर्क स्थापित करने के लिए सदैव लालायित रहती हैं। जिसने आत्माकर्षिणी विद्या के द्वारा किसी यक्षिणी को सिद्ध कर लिया है, उसकी प्रत्येक कामना को वे पूर्ण करती हैं। लेकिन साधक को इसका मूल्य चुकाना पड़ता है उसकी काम-पिपासा को शान्त करके। कभी-कभी यक्षिणियां भी सशरीर प्रकट हो जाती हैं और इच्छानुसार रूप धारण कर लेती हैं। वास्तव में यक्षिणियां अति रहस्यमयी होती हैं। जो उनके चंगुल और मायाजाल में एक बार फंस गया, उसका फिर शीघ्र मुक्त होना संभव नहीं। इस विश्वब्रह्माण्ड में जितने भी प्रकार के प्राणी होते हैं, वे सभी प्राण तथा उसके विभिन्न आयामों द्वारा संचालित होते हैं। जहां तक आत्माओं का सम्बन्ध है, वे स्वयं की नैसर्गिक ऊर्जा द्वारा होती हैं संचालित और उसी के आधार पर इच्छानुसार रूप धारण कर लेती हैं। ऐसी ही आत्माओं को विशुद्ध आत्मा कहते हैं। यक्षों में सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इनमें प्राण-शक्ति और आत्म- शक्ति--दोनों का सामंजस्य है। वे जितने देवताओं के निकट हैं, कहीं उससे अधिक निकट हैं वे मनुष्यों के लिए। यजन करने वाली जाति को *यक्ष* कहते हैं। हमें यह बात ज्ञात होनी चाहिए कि ब्रह्मा ने सबसे पहले पंचतत्वों में जल की उत्पत्ति की और उसके पश्चात् अन्य प्राणियों का निर्माण किया। जल का अर्थ है--जीवन देने वाला। इसीलिए इसकी सबसे पहले उत्पत्ति की गयी प्राक्काल में। जिन-जिन प्राणियों का निर्माण हुआ था--वे सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गए और कहने लगे कि हम सब भूख-प्यास से व्याकुल हैं। ब्रह्मा ने कहा--जल की रक्षा करो। एकमात्र जल ही जीवन है। कालान्तर में जल तत्व द्वारा ही अन्य पदार्थों का निर्माण होगा, इसलिए उसकी रक्षा करो। यह सुनकर उन समस्त प्राणियों में से अधिकाँश बोल उठे--'वयं रक्षामः' (हम रक्षा करेंगे) और उनमें से कुछ बोल उठे--'वयं यक्षामः' (हम यजन करेंगे अर्थात् यज्ञ करेंगे)। 'वयं रक्षामः' बोलने वाले रक्ष संस्कृति के कारण आगे चल कर राक्षस या दानव कहलाये और 'वयं यक्षामः' कहने वाले यक्ष संस्कृति (यज्ञ-याग) के फलस्वरूप कहलाये--यक्ष। इस प्रकार हम देखते हैं कि मूल रूप से एक समय दो ही जातियां थीं। एक थी--यक्ष और दूसरी थी राक्षस। यक्ष ही आगे चलकर आर्यावर्त में मनु की सन्तान होने के फलस्वरूप मानव कहलाये। इस तरह पृथ्वी पर दानव और मानव दो प्रकार के शरीरधारी प्राणी बने सर्वप्रथम। मानव में प्रकृति प्रदत्त 'मन' की प्रधानता है-इसीलिए उसे मनुष्य कहा गया। जबकि दानव में है बुद्धि चातुर्य की प्रधानता। अग्नि पुराण के अनुसार यक्षों की उत्पत्ति प्रचेता अर्थात् वरुण से हुई। इसलिए जलतत्व का प्रतीक वरुण है। जलतत्व व्यापक काम की स्थिति है और यही कारण है कि यक्ष-यक्षिणियां अत्यधिक कामातुर और कामाचारी होते हैं। मनुष्य से सौ गुना अधिक कामाचारी होते हैं--यक्ष-यक्षिणियां।जय माँऊँ नमःशिवाय🙏🌹🙏

हर पुरुष (गृहस्थ) की अपनी एक यज्ञशाला (पत्नी) होनी चाहिये। हर स्त्री (विवाहिता) का अपना एक याज्ञिक (वाजपेय पुरुष) वा पति होना चाहिये। यह यज्ञ (मैथुन) यथा समय होते रहना चाहिये। इससे दोनों स्त्री-पुरुष का ऐश्वर्य बढ़ता है। यह मैथुन यज्ञ तीन प्रकार का होता है।तामसी मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष जब अपना स्वार्थ देखता है, स्त्री के स्वार्थ (आनन्द) की अवहेलना करता है तो वह पिशाच होता है। जब स्त्री ऐसा करती है तो वह पिशाचिनी की संज्ञा प्राप्त करती है। कलियुग में ऐसे यज्ञ अधिक हो रहे हैं।राजसी मैथुन- इसमें स्त्री और पुरुष परस्पर के सुख का ध्यान रखते हैं। ऐसे स्त्री-पुरुष क्रमशः यक्षिणी एवं यक्ष कहलाते हैं।सात्विक मैथुन- इस यज्ञ में पुरुष को सतत चेष्ठा रहती है कि वह स्त्री को पूर्णतः तृप्ति पुरुष को सुसन्तुष्ट रखती है। ऐसे स्त्री पुरुष क्रमशः ऋषि और ऋषिकाएं होते हैं। अपनी ही वेदी (स्वस्त्रीयोनि) में ही पुरुष हवन करे, दूसरे की वेदी (परस्त्रीयोनि) में नहीं। धर्मसंगत होने पर ही दूसरे की वेदी पर हवन किया जा सकता है। ऐसा उदाहरण हमारे धर्मशास्त्र में बहुत है। आप खुद भी पढ़ सकते हैं।गृहस्थी का यही आचार धर्म है कि वह स्त्री को यज्ञ रूप जान कर उसके साथ बर्ताव करे। इस धर्म का समर्थन आणि उद्दालक, मौद्रल्य नाक एवं कुमार हारीत ने अपनी-अपनी स्मृतियों में किया है। "एतद्ह स्म वै तद्विद्वानुद्दालक आरुणि: आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ह स्म वै तद्विद्वान्कुमारहारित आह ।" (बृह.उप. ६।४।४)साधक आनंदमुक्त

नियोग क्रिया : शास्त्रीय सत्य, भ्रम नहीं

नियोग क्रिया भारतीय वैदिक समाज की एक प्राचीन, गंभीर और धर्मसम्मत व्यवस्था थी, जिसे आज के दृष्टिकोण से अक्सर गलत समझ लिया जाता है। यह विषय न तो तंत्र से जुड़ा था, न ही भोग या वासना से। इसका मूल उद्देश्य केवल वंश-परंपरा की रक्षा और धर्म की निरंतरता था। नियोग का अर्थ है— ऐसी स्थिति में जब किसी स्त्री का पति संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हो या उसका निधन हो चुका हो, तब शास्त्र और समाज की अनुमति से किसी योग्य, तपस्वी या ऋषि के माध्यम से केवल संतानोत्पत्ति कराना। इसमें स्त्री का पति नहीं बदलता था और न ही नया दाम्पत्य संबंध बनता था। सबसे पहले नियोग का उल्लेख ऋग्वैदिक और ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है। महाभारत इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण प्रस्तुत करता है। राजा विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद हस्तिनापुर के वंश को बचाने के लिए महर्षि वेदव्यास द्वारा रानी अंबिका और अंबालिका के साथ नियोग किया गया। इसी प्रक्रिया से धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ, जबकि दासी से विदुर का जन्म हुआ। यह नियोग क्रिया का ऐतिहासिक और शास्त्रीय प्रमाण है। इस विषय पर सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न यही है कि क्या नियोग में प्रत्यक...

स्त्री पुरुष मिलन और तंत्र

यह विषय तांत्रिक परंपरा में अत्यंत रहस्यमय, उत्तेजक और आध्यात्मिक माना जाता है। स्त्री-पुरुष संभोग को तंत्र में सिर्फ शरीर का मिलन नहीं, बल्कि शक्तियों का विस्फोट कहा गया है। जब स्त्री का कामुक आकर्षण और पुरुष की उग्र इच्छा एक बिंदु पर पहुँचकर टूटते हैं, तब भीतर एक ऐसी ऊर्जा उठती है जिसे साधारण भाषा में इच्छा, लेकिन तंत्र में दिव्य शक्ति कहा गया है। तांत्रिक मान्यता है कि उस क्षण में साधक का मन, देह, श्वास और चेतना – सब नियंत्रण खोकर भी किसी अदृश्य शक्ति के अधीन हो जाते हैं, और यही क्षण साधना का “द्वार” खोलता है। शक्ति को स्त्री रूप में और शिव को पुरुष रूप में देखा गया। इसलिए संभोग को शक्ति और शिव के मिलन का प्रत्यक्ष रूप माना गया। जब यह मिलन केवल देह का नहीं बल्कि मंत्र, प्राण और ध्यान के साथ होता है, तब साधक की देह आनंद में डूबी हुई दिखाई देती है, पर भीतर ऊर्जा सूक्ष्म मार्गों को फाड़कर ऊपर की ओर बहने लगती है। कुंडलिनी का ताप, हृदय की धड़कन और श्वास की उत्तेजना – ये सब साधना का माध्यम बनते हैं, लक्ष्य नहीं। यह साधना हर किसी के लिए नहीं होती। यह केवल दीक्षित साधक, गुरु के मार्गदर्शन म...

रति और कामदेव

रति भारतीय काम-तत्त्व की देवी है, जो कामदेव की सहधर्मिणी, प्रेरणा और शक्ति का दिव्य रूप मानी जाती है। यह कोई अवतार नहीं, बल्कि स्वयं सौंदर्य, कामना, सौम्यता और दैवी आनंद की मूर्ति है। पुराणों में कहा गया है कि रति को स्वयं ब्रह्मा ने सृष्टि के भावात्मक संतुलन के लिए उत्पन्न किया, ताकि मनुष्य में आकर्षण, मिलन और प्रजनन की ऊर्जा जागृत रहे। तांत्रिक परंपरा में रति की साधना अत्यंत गोपनीय मानी जाती है। इसे साधारण लोग नहीं, बल्कि काम-तत्त्व, वामाचार और भैरवी-मार्ग के साधक करते हैं। इसका उद्देश्य वासना की पूर्ति नहीं, बल्कि ऊर्जा का रूपांतरण, चित्त की शुद्धि और शक्ति का उत्कर्ष होता है। कामदेव और रति का दिव्य संभोग केवल शरीर का मिलन नहीं, बल्कि ब्रह्मांड में प्रवाहित सृजन-शक्ति का प्रतीक है। इनका मिलन उन दो तत्वों का योग है जिनसे संसार चलता है – इच्छा और ऊर्जा। मनुष्य जिस भाव को "क काम" समझता है, वह वस्तुतः ब्रह्मांडीय शक्ति की क्रिया है, जिसे देवताओं के रूप में समझाया गया। रति केवल स्त्रियों को नहीं, बल्कि पुरुष और स्त्री दोनों में मानसिक, भावनात्मक और काम-ऊर्जा जगाती है। रति ...

चामुण्डा शक्ति

 चामुंडा वह शक्ति है जो भय को जन्म लेने से पहले ही भस्म कर देती है। यह वह उग्र ऊर्जा है जो मानव के भीतर छिपे अंधकार, कमजोरी और पराधीनता को निगलकर उसे निर्भय और तेजस्वी बनाती है। श्मशान, रात, तंत्र, मुंडमाला, व्याघ्रचर्म और गधे पर सवार उनका रूप केवल भयंकर नहीं, बल्कि जीवन के उस सत्य का स्मरण है जिसमें मृत्यु और भय पर विजय के बिना कोई साधक दिव्यता को छू नहीं सकता। चामुंडा का नाम ही चंड और मुंड जैसे अहंकारी असुरों के विनाश से बना, इसलिए इनके ध्यान से मनुष्य के भीतर का असुर रूप टूटता है। यह देवी बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि भीतर की क्रूर प्रवृत्तियों को मार कर मनुष्य को सच्चे अर्थों में विजयी बनाती है। चामुंडा साधना जीवन को साधारण नहीं, अलौकिक दिशा में ले जाने वाली साधना है। कहा गया है कि जो साधक इनके मंत्र में रमता है, उसके भीतर की जड़ता, भय, नकारात्मक विचार, दुर्भाग्य और मानसिक दुर्बलता नष्ट होती है। यह साधना साधक को अदृश्य शक्तियों से संरक्षण, मनोबल, तेज, आकर्षण, तांत्रिक प्रभाव, शत्रुनाश और आत्मिक स्वतंत्रता देती है। इनकी कृपा से भूत-बाधा, दुष्ट शक्तियाँ, मानसिक विकार, रोग, काली ऊर्जा औ...