स्त्री पुरुष मिलन और तंत्र

यह विषय तांत्रिक परंपरा में अत्यंत रहस्यमय, उत्तेजक और आध्यात्मिक माना जाता है। स्त्री-पुरुष संभोग को तंत्र में सिर्फ शरीर का मिलन नहीं, बल्कि शक्तियों का विस्फोट कहा गया है। जब स्त्री का कामुक आकर्षण और पुरुष की उग्र इच्छा एक बिंदु पर पहुँचकर टूटते हैं, तब भीतर एक ऐसी ऊर्जा उठती है जिसे साधारण भाषा में इच्छा, लेकिन तंत्र में दिव्य शक्ति कहा गया है। तांत्रिक मान्यता है कि उस क्षण में साधक का मन, देह, श्वास और चेतना – सब नियंत्रण खोकर भी किसी अदृश्य शक्ति के अधीन हो जाते हैं, और यही क्षण साधना का “द्वार” खोलता है।

शक्ति को स्त्री रूप में और शिव को पुरुष रूप में देखा गया। इसलिए संभोग को शक्ति और शिव के मिलन का प्रत्यक्ष रूप माना गया। जब यह मिलन केवल देह का नहीं बल्कि मंत्र, प्राण और ध्यान के साथ होता है, तब साधक की देह आनंद में डूबी हुई दिखाई देती है, पर भीतर ऊर्जा सूक्ष्म मार्गों को फाड़कर ऊपर की ओर बहने लगती है। कुंडलिनी का ताप, हृदय की धड़कन और श्वास की उत्तेजना – ये सब साधना का माध्यम बनते हैं, लक्ष्य नहीं।

यह साधना हर किसी के लिए नहीं होती। यह केवल दीक्षित साधक, गुरु के मार्गदर्शन में, नियम और ब्रह्मचर्य की शक्ति के साथ करता है। क्योंकि तंत्र में संभोग का उद्देश्य सुख नहीं, बल्कि ऊर्जा का विस्फोट, चैतन्य का विस्तार और आत्मानंद का अनुभव है। कहा गया कि जो संभोग में खो गया, वह भोगी; जो संभोग को ऊर्जा में बदल गया, वह योगी।

साधारण मनुष्य संभोग को शरीर की भूख समझकर भोग में डूबता है, जबकि तांत्रिक उसी क्रिया को साधना में बदलकर चेतना की उग्र अग्नि में परिवर्तित करता है। इसी कारण तांत्रिक संभोग वर्जित भी है, रहस्यमय भी और अतुलनीय रूप से शक्तिशाली भी।

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