कामाख्या पीठ: योनि कुंड
कामाख्या पीठ पर स्थित योनि-कुंड को शास्त्रों में आदि-शक्ति की देह का अवशेष माना गया है। मान्यता है कि शक्ति की अमर ऊर्जा पृथ्वी पर उतरकर स्वयं को मातृ-शक्ति के रूप में व्यक्त करती है और उसी अभिव्यक्ति का रूप है मासिक धर्म। इसलिए कामाख्या में वर्ष में एक बार रक्तिम जल प्रकट होता है, जिसे शक्ति के रजस्वला स्वरूप का दिव्य संकेत माना गया है। यह किसी साधारण शारीरिक प्रक्रिया का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति की सृजन-शक्ति का रहस्य है।
प्रत्येक स्त्री को माहवारी इसलिए आती है क्योंकि प्रकृति उसे सृजन की क्षमता प्रदान करती है। यह रक्त नष्ट नहीं, बलिदान है। शरीर अपने भीतर की शक्ति को एक चक्र में परिवर्तित करता है और उसी चक्र से स्त्री की कामना, ऊर्जा, अंतर्ज्ञान और मातृत्व का जन्म होता है। यह रक्त विशेष होता है क्योंकि इसमें जीवन को उत्पन्न करने की क्षमता, ऊष्णता और प्राण तत्व मौजूद होते हैं। यह प्रकृति का शाप नहीं, वरदान है।
तंत्र में इस रक्त को साधारण अशुद्धि नहीं, बल्कि शक्ति-तत्व माना गया है। यह ऊर्जा, आकर्षण, मन्त्र-सिद्धि और इच्छा-सिद्धि से सम्बद्ध माना जाता है। तांत्रिक ग्रंथ कहते हैं कि संसार की हर सृजन-शक्ति एक सूक्ष्म रक्त-रहस्य से संचालित होती है। स्त्री का रजोगर्भ ही मंत्रों को जीवंत, अनुष्ठानों को फलदायी और साधक को तेजस्वी बनाता है। इसलिए नारी-शरीर को केवल भोग का केन्द्र कहना अज्ञान और तंत्र में इसे शक्ति-मंदिर मानना ज्ञान है।
कामाख्या की परंपरा बताती है कि देवी की ऊर्जा को समझने के लिए पुरुष को देह नहीं, चेतना से देखना पड़ता है। जहां लोग रक्त देखकर घृणा करते हैं, तंत्र वहीं जीवन, शक्ति और रहस्य देखता है। यहां काम वासना नहीं, साधना है। देह नहीं, ऊर्जा है। इस ऊर्जा को जो समझ लेता है, वह संसार से ऊपर उठ जाता है।
Dr. Sushil kashyap
Comments
Post a Comment